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बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड

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About Khadi

खादी या खद्दर भारत में हाथ से बनने वाले वस्त्रों को कहते हैं। खादी वस्त्र सूती, रेशम, या ऊन से बने हो सकते हैं। इनके लिये बनने वाला सूत चरखे की सहायता से बनाया जाता है।

खादी वस्त्रों की विशेषता है कि ये शरीर को गर्मी में ठण्डे और सर्दी में गरम रखते हैं।

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में खादी का बहुत महत्व रहा। गांधीजी ने १९२० के दशक में गावों को आत्मनिर्भर बनाने के लिये खादी के प्रचार-प्रसार पर बहुत जोर दिया था।

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खादी में गुण बहुत हैं

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खादी के बने कपड़े गर्मी और सर्दी दोनों ही मौसम के अनुकूल होते हैं। गर्मी के मौसम में ये पसीने को सोख लेते हैं, साथ ही मज़बूत होने के कारण सर्दियों में ये ठंड से भी बचाते हैं। ये वस्त्र जितने धोए जाते हैं, उतना ही इनका लुक बेहतर होता जाता है।

यह मज़बूत कपड़ा होता है और कई साल तक नहीं फटता। ये त्वचा के लिए नुकसानदायक नहीं है। हां, इतना आप भी ख्याल रखें कि गर्मी के मौसम में हल्की खादी के बने और पेस्टल रंग के वस्त्र लें और सर्दियों में मोटी खादी के एम्ब्रॉयडरी किए गए परिधान पहनें।

किस्म किस्म की खादी

खादी को सिल्क, वूल और कॉटन के साथ मिक्स किया जा रहा है। सिल्क और खादी के वस्त्रों को 50-50 प्रतिशत के अनुपात से बनाया जाता है। यह फैब्रिक महंगा है, लेकिन राजैसी लुक देता है। इसमें सलवार-कमीज़, कुर्ता-पाजामा, साड़ी, जैकेट आदि परिधान मिल जाएंगे।

कॉटन खादी

खादी को कॉटन के साथ मिक्स करके एक मुलायम टैक्स्चर के रूप में तैयार किया जा रहा है। इस फैब्रिक को लिनेन कहा जाता है। यह खादी का मॉडर्न रूप है। अक्सर लिनेन को खादी का सुधरा हुआ रूप भी कहा जाता है। खादी व कॉटन के इस मेल में प्लेन के साथ ही प्रिंटेड फैब्रिक भी मिलता है।

इस फैब्रिक में मेल, फीमेल और बच्चों के लिए एक से बढ़कर एक खूबसूरत कुर्ते मार्केट में मिल रहे हैं। इसके अलावा खादी कॉटन की बनी साड़ियां, सलवार-सूट, वेस्टर्न टॉप, शर्ट, ट्राउज़र्स, स्कर्ट, रूमाल आदि मनमोहक डिज़ाइनों व वाजिब दामों में मिल रहे हैं।

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पॉलिएस्टर खादी

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खादी किसी भी प्रकार से फैशन के मामले में पीछे नहीं है। फैशन की इसी रेस में खादी को पॉलिएस्टर के साथ मिक्स करके एक आरामदायक टैक्स्चर तैयार किया जा रहा है।

इस फैब्रिक पर डिज़ाइनर कमल वाडकर ने इंडियन और वेस्टर्न दोनों प्रकार की ड्रेस डिज़ाइन कीं।

इसमें साड़ी, टॉप, कुर्ते, सलवार-कमीज़, रैप-अराउंड के अलावा डिज़ाइनर ड्रेस भी आप ले सकते हैं।

यह धोने में आसान है, किंतु किसी अच्छे वॉशिंग पाउडर से हाथ से ही धोएं। मशीन में न धोएं।

सिल्क खादी

खादी के साथ सिल्क को मिक्स करके बहुत ही आकर्षक फैब्रिक तैयार किया जाता है। इस फैब्रिक में चमक होती है। इससे बने परिधान किसी विशेष अवसर, जैसे किसी पार्टी, शादी या दीपावली जैसे त्योहारों पर पहने जा सकते हैं। इन्हें पहन कर आपकी पर्सनेलिटी सबसे अलग नज़र आएगी।

इस फैब्रिक में खादी और सिल्क को पचास प्रतिशत के अनुपात में मिक्स किया जाता है। पहली धुलाई के बाद यह कपड़ा तीन प्रतिशत तक सिकुड़ता है। यह फैब्रिक खादी के बाकी फैब्रिक से महंगा है। खादी सिल्क के बने सलवार-कमीज़, कुर्ता-पायजामा, साड़ी, दुपट्टा, शर्ट, जैकेट आदि मनमोहक डिज़ाइन और रंगों में मार्केट में मिल जाएंगे। इन्हें काफी देखभाल की ज़रूरत होती है। ये वस्त्र ड्राइक्लीन ही कराए जाते हैं।

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वूलन खादी

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खादी और वूल के मेल से बने वस्त्र भी आपकी पर्सनेलिटी में चार चांद लगा देंगे। ओवरकोट, नाइटगाउन, जैकेट, लॉन्ग जैकेट, शॉल, स्टोल, टोपी, कंबल, जुराबें आदि खादी भंडार से अच्छी रेंज में आप ले सकते हैं।

ये वस्त्र आपकी त्वचा को कोई नुकसान नहीं देंगे और लुक को बनाएंगे बेहतर। इनकी केयर आपको करनी होगी यानी इनकी धुलाई गर्म पानी में न करें। ईज़ी वॉश ही करें। अगर पहली बार ड्राइक्लीन करा लें तो इनकी रौनक में कोई कमी नहीं आएगी।

डाइंग खादी

डाइंग खादी का मतलब है डाई यानी कलर की गई खादी। कुछ डिज़ाइनर इसको और ज्यादा आकर्षक रूप देने के लिए डाई करके नए रंगों में मिनी स्कर्ट, रेसर टॉप, हॉल्टर नेक टॉप आदि तैयार कर रहे हैं। इन रंगों में लाइम ग्रीन, वॉयलेट, बेबी पिंक आदि हैं।

खादी और हैंडलूम को लेकर लोग अक्सर उलझन में पड़ कर दोनों को एक ही समझ बैठते हैं, लेकिन इन दोनों में अंतर यह है कि खादी हाथ से बनाई जाती है, जबकि हैंडलूम मिलों में मशीनों द्वारा बनता है, यानी खादी चरखे से बनती है और हैंडलूम करघे से।

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फस्र्ट खादी डिजाइनर-गांधीजी

खादी के पहले भारतीय डिज़ाइनर गांधीजी ही हैं, यह कहना गलत नहीं होगा। सबसे पहले खादी के महत्त्व से भारतवासियों को उन्होंने ही अवगत कराया था। गांधीजी ने कहा था कि खादी के वस्त्र पहनना न सिर्फ अपने देश के प्रति प्रेम और भक्ति-भाव दिखाना है, बल्कि कुछ ऐसा पहनना भी है, जो भारतीयों की एकता दर्शाता है। उन्होंने इस प्रकार अंग्रेजों का ही नहीं, आम जीवन के काम आने वाली विदेशी वस्तुओं का भी बहिष्कार किया। गांधीजी ने कहा कि ‘स्वराज’ यानी अपना शासन पाना है तो ‘स्वदेशी’ यानी अपने हाथों से बनी देशी चीजों को अपनाना होगा। इसीलिए खादी स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सच्चा भारतीय होने की पहचान भी कहलाई।

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